बचपन
माँ की आँचल में-में फिरसे छुपना चाहता हूं.
माँ की लोरी सुनके उसके गोद में सोना चाहता हूं..
नानी की वो राजा-रानी की कहानीया फिरसे जीना चाहता हूं..
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं...
कटी पतंगों के पिछे दूर तक भागना चाहता हूं..
झूले पर झूल के एक बार फिर आसमान को छूना चाहता हूं..
लाल परी के साथ, गाव जाते वक्त खिडकी के बाहर का नजारा फिरसे महसूस करना चाहता हूँ..
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं..
दोस्तों के साथ सायकल पर दूर तक जाना चाहता हूं..
उनके साथ नदी में तैरने का मजा लेना चाहता हूं..
और शाम को देर होने की वजह से माँ की डाट खाना चाहता हूं..
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं..
भाई-बहन के साथ गरमी में आईसक्रीम का मजा लूटना चाहता हूं...
खेलने के बाद पेड के छाव मे फिरसे सोना चाहता हूं..
आम, इमली, बेर और सारे फलों का सवाद फिरसे चखना चाहता हूं ...
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं..
पकड़ा-पकडी, लुकाछिपी, गिल्ली डंडा सारे खेल खेलना चाहता हूं..
खेलते वक्त झगड़ा करके रोते-रोते घर आके माँ के पल्लू से अपनी आँखें पोछना चाहता हूं..
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं...
क्योंकि आज फिरसे मे बच्चा बनाना चाहता हूं...
~ करण बेंडकुळे.
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